जगदलपुर। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरे की पारंपरिक रस्में पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जा रही हैं। इसी कड़ी में मां दंतेश्वरी की डोली और छत्र के साथ राजपरिवार के सदस्य जगदलपुर पहुंचे। इस दौरान दंतेवाड़ा जिले के कलेक्टर, एसपी और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों ने परंपरा के अनुसार माता का स्वागत किया।
कांटाबंद पहनकर कमलचंद्र भंजदेव ने की माता की आराधना
बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव ने मावली परघाव की पारंपरिक रस्म में शामिल होकर कांटाबंद धारण किया और माता की आराधना की। कांटाबंद फूलों से बना एक विशेष मुकुट होता है, जिसे बस्तर के राजा परंपरा के अनुसार धारण करते थे।
कमलचंद्र भंजदेव ने बताया कि कांटाबंद में इस्तेमाल होने वाले फूल बस्तर के जंगलों में पाए जाते हैं। इस परंपरा का अपना विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। उन्होंने कांटाबंद पहनकर मां दंतेश्वरी के छत्र और मां मावली की डोली को प्रणाम किया। इसके बाद डोली को कंधे पर उठाकर राजमहल ले जाया गया।उन्होंने बताया कि मां दंतेश्वरी और मां मावली बस्तर राजपरिवार की कुलदेवियां हैं। सदियों से दोनों देवियां बस्तर दशहरे की परंपराओं का हिस्सा रही हैं। दशहरे के दौरान माता राजमहल परिसर में विराजमान रहेंगी।
बस्तर दशहरे की अनूठी परंपरा देखने पहुंचे देश-विदेश के पर्यटक
बस्तर दशहरे की मावली परघाव रस्म को देखने के लिए छत्तीसगढ़ के अलावा ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना सहित कई राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु जगदलपुर पहुंचे। इस अनूठे आयोजन को देखने के लिए डेनमार्क से विदेशी पर्यटकों का एक समूह भी पहुंचा।पहली बार बस्तर आए पर्यटकों ने यहां की संस्कृति, धार्मिक आस्था और पारंपरिक रीति-रिवाजों को करीब से देखा। पर्यटकों ने स्थानीय लोगों के सरल और सहज व्यवहार की सराहना करते हुए कहा कि बस्तर दशहरे की रस्में अन्य स्थानों की परंपराओं से काफी अलग और अनूठी हैं।
दंतेवाड़ा जाकर दिया गया था दशहरे का निमंत्रण
बस्तर दशहरे की परंपरा के अनुसार, राजपरिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव शारदीय नवरात्र की पंचमी को दंतेवाड़ा पहुंचे थे। वहां उन्होंने मां दंतेश्वरी को मंगल पत्र अर्पित कर बस्तर दशहरे में शामिल होने का निमंत्रण दिया था।इसके बाद अष्टमी के दिन मां की डोली और छत्र को जगदलपुर के लिए रवाना किया गया। देर रात इनके पहुंचने के बाद मंगलवार की शाम मावली परघाव की पारंपरिक रस्म पूरी की गई। इस रस्म में राजपरिवार माता की डोली और छत्र का पारंपरिक तरीके से स्वागत करता है।
नौ दिनों की तपस्या के बाद पूरी हुई जोगी उठाई की रस्म
बस्तर दशहरे की महत्वपूर्ण धार्मिक परंपराओं में जोगी उठाई की रस्म भी शामिल है। जगदलपुर के सिरहासार भवन में यह रस्म पूरी की गई। परंपरा के अनुसार, जोगी नौ दिनों तक उपवास रखकर कुंड में बैठते हैं और माता की आराधना करते हैं।दशहरे की शुरुआत में जोगी तपस्या पर बैठते हैं। नौ दिनों की साधना पूरी होने के बाद उन्हें कुंड से उठाया जाता है। इसके साथ ही जोगी उठाई की परंपरा संपन्न होती है। इस रस्म का बस्तर दशहरे में विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है।माता के आगमन और दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु घरों की छतों पर भी मौजूद रहे। लोगों में माता के स्वागत को लेकर खास उत्साह देखने को मिला।
विजय रथ की परिक्रमा के बाद होगी भीतर रैनी की रस्म
बस्तर दशहरे के आगामी चरण में आठ चक्कों वाले विजय रथ की परिक्रमा की जाएगी। इस दौरान किलेपाल क्षेत्र के ग्रामीण पारंपरिक रूप से रथ खींचेंगे। परिक्रमा पूरी होने के बाद भीतर रैनी की रस्म निभाई जाएगी।भीतर रैनी बस्तर दशहरे की प्राचीन और विशिष्ट परंपराओं में से एक है। इस रस्म में ग्रामीण प्रतीकात्मक रूप से विजय रथ को अपने कब्जे में लेते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में स्थानीय ग्रामीणों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।बस्तर दशहरे की ये रस्में यहां की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक आस्था और सदियों पुरानी परंपराओं को जीवंत बनाए हुए हैं। यही वजह है कि इस अनूठे आयोजन को देखने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ विदेशों से भी पर्यटक पहुंचते हैं।
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